दिल की बात ।

क्या ख़ूब कहा 

किसी प्रेयसी ने पिया से अपने,
राधा की बात और सही

मुझे तो रुक्मणि होने की कहीं ज़्यादा इच्छा है ! 💕

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वो मुलाकात।

जल रहा था चाँद धीरे धीरे उस पल रात में 

काँपते थे होंठ तेरे तेरी ही हर बात में 

उठ रही थी श्वास जो ज्वाला लिए थी प्यार की 

न ही तुमको न ही हमको सुध रही संसार की 

मध्य में अवरोध थे जो तोड़ डाले थे सभी 

जाने क्या सहसा हुआ कि रुक गए थे हम तभी 

मैं समझ पाया नहीं था न तुम्हें समझा सका 

तुम निकट कितने थीं मेरे फिर भी तुम्हें न पा सका 
पढ़ के मेरे नैन को जब तुम समझतीं थीं मुझे 

मौन हो कर कितना ही कुछ यूँ ही कहतीं थीं मुझे 

कौन हूँ मैं क्या हूँ तुम्हारा ये बतातीं थीं मुझे 

जब झुका कर अपनी पलकें तुम छुपाती थीं मुझे 

क्या थी परिभाषा समय की अर्थ क्या था भाग्य का 

प्रेम का वह गीत रचना व्यर्थ का था भाग्य का 

जो अधर रखा हुआ था गीत मैं न गा सका  

तुम निकट कितने थीं मेरे फिर भी तुम्हें न पा सका